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Saturday, November 17, 2012

शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये



शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये

डाल नज़र धूल भरे इन सफ़ों पे, कहीं तुझे ज़िन्दगी मिल जाये
शायद तुझे कहीं अपनी सी कोई कहानी मिल जाये,
पलट इस गर्द को, कोई भूली हुई दास्ताँ मिल जाये
कोई याद का किस्सा झूमता हुआ, तेरी रहगुज़र मिल जाये,
इक छूटा हुआ साथी, मुट्ठी भर हंसी, दो बोल ख़ामोशी मिल जाये
खुशबू बसी दीवारों में कोई सन्नाटा चीरता ठहाका मिल जाये,
डाल नज़र शायद कोई याद मिल जाये, शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये......
बैठ के राहत की सांस, माथे से पोंछा पसीना मिल जाये 
भाग दौड़ के बीच यूँ ही गुनगुनाया हुआ कोई गीत मिल जाये,
सर्द शामों में हाथो में थमी इक प्याली चाय मिल जाये 
मुस्कुराते हुए ज़िन्दगी के साथ ख़ुशी भरी इक चुस्की मिल जाये,
 तकरार और नाराज़गी के बीच मान जाने का अजीब सा कोई किस्सा मिल  जाये 
डाल नज़र शायद कोई याद मिल जाये, शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये......
इक सुबह आँखें मलते हुए कोई ख़्वाब पुराना मिल जाये 
परेशानी खिंची माथे पे इक लकीर तस्सली मिल जाये
थके हुए कदमों को घर का वो खिलखिलाता रास्ता मिल जाये,
लकड़ी की इस अलमारी में पुरानी कोई किताब रूमानी मिल जाये 
टपकती छत की उलझन में बहती कोई कागज़ की कश्ती मिल जाये,
डाल नज़र शायद कोई याद मिल जाये, शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये......
दूर किसी कोने में  मुस्कुराती झांकती कंचों की कोई पोटली मिल जाये
इन्ही जाने पहचाने दरख्तों के तले, लुका छिपी का कोई खेल अधूरा मिल जाये, 
गर्म दोपहरों की थपेड़ों में घंटी बजाता अपनी ओर आता कोई ठेले वाला मिल जाये 
डाल नज़र शायद कोई याद मिल जाये, शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये...... 
संज़ीदा से  चेहरे के पीछे इक भूली -बिसरी शरारत मिल जाये 
ज़माने की गर्द हटाके आइने में संवारा इक चेहरा मासूम मिल जाये,
डाल नज़र शायद कोई याद मिल जाये, शायद कहीं ज़िन्दगी मिल जाये......