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Wednesday, June 5, 2013

इक बूँद




इक बूँद 

उदास चेहरा लिए किसान आसमान को घूर रहा था, बर्बाद फसल के  लिए बारिश को कोस रहा था
साल भर की मेहनत याद कर दुखी मन, कभी बंज़र ज़मीन, और कभी भगवान को दोष दे रहा था 
तभी छिटपुट दो बादलों में हलचल हुई, इक बूँद बलखाती हुई किसान की हथेली पे पड़ी
देख के बूँद किसान झुंझला पड़ा, अब क्या ज़रूरत तुम्हारी कह के बूँद की तरफ बढा
तभी बूँद बोल पड़ी ज़रूरतें तुम्हारी बहुत पूरी की है, बस इक सवाल पूछने क लिए मैने बूँद की शक्ल ली है 
किसान की झुंझलाहट बढ़ गई, सवाल के नाम पे चेहरे पे घबराहट चढ़ गई
बूँद बोल उठी पानी के लिए प्रकृति को दोष देते हो,कभी खुद के गिरेबां में क्यों नहीं झांकते हो
कुदरत ने तुम्हे नीले रंग से भरपूर जल दिया, नदी तालाब झरनों  का अनुपम उपहार दिया
किन्तु लालसा की अंधी दौड़ में हे मानव तुमने इसी प्रकृति का दोहन किया 
नदियों तालाबों को कारखानों का कूड़ादान बना दिया, बढती आबादी की ज़रूरत का दबाव तुमने प्रकृति पर डाल दिया 
बह रहा है जल तो बह रह है प्यासों को राहत नहीं, 
कतार में अनगिनत गागर है पर तुमको दायित्व का अहसास नहीं
खेती के लिए जंगल सिमट रहे है, भूमि के दोहन से जल के स्त्रोत मिट रहे है 
स्वार्थी मनुष्य तेरी प्यास बुझाने के लिए नन्हे जीव जंतु भी प्यासे मर रहे है 
फिर भी तुझे लिहाज़ नहीं, अपनी गलतियों का अहसास नहीं
अपनी बर्बादी का शोक मनाता है, और प्रकृति को दोषी ठहराता है
बहुत हुआ प्रकृति के संयम का इम्तिहान न ले, अब भी जाग जा अपने सर पे अपने विनाश का इल्ज़ाम न ले 
जो अब भी न जागेगा तो विनाश लिखित है, प्रकृति विनाश करेगी ये घोषित है 
पानी का मोल समझ के हर बूँद का संचय कर, ये बात हर इंसान को समझा और धरती को विनाश से दूर कर
ये बात कह के बूँद बिखर गई, और शायद किसान की बुद्धि संवर गई 
उसने खुद को वचन दिया जल संचय का प्रण लिया 
अब न वो प्रकृति को दोष देगा, स्वयं अपने कर्मों का भोगी बनेगा 
दोहन अब बहुत हुआ, अब वो प्रकृति को नए सिरे से पोषित करेगा...

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