मेरी माँ
सकुचाई शरमाई नई नवेली दुल्हन से जाने कब संज़ीदा हो गई माँ
कोमल शाख़- ओ - पत्ती से जाने कब घना दरख़्त हो गई माँ
रात तारों के आँचल से जाने कब सुबह हो गई माँ
सर्द हवाओं में बुनते बुनते जाने कब मेरा स्वेटर हो गई माँ
जेठ की दुपहरी में बिजली जाते ही इक हवा का झोंका हो गई माँ
हम बहनों की गपशप में जाने कब गरम चाय बन के शामिल हो गई माँ
उनींदी बचपन की रातों में थपकी देती आँखों की निंदिया हो गई माँ
नासाज़ मेरी हालत पर जागते जागते जाने कब सो गई माँ
बच्चों की मुस्कराहट की ज़द्दोज़हद में जाने कब गुमसुम हो गई माँ
आँचल से पोंछ कर मेरे आंसू, मेरे होंठों की हंसी हो गई माँ
हर मोड़ पे आसान करती मेरी राह जाने कब मेरी मंज़िल हो गई माँ
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ReplyDeleteबेहद भावपूर्ण लेखनी ... अत्यंत ही मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति ...
ReplyDeleteसर्द हवाओं में बुनते बुनते,
जाने कब मेरा स्वेटर हो गई माँ
जेठ की दुपहरी में बिजली जाते हीइक हवा का झोंका हो गई माँ
खूब से भी खूबत्तर !