तुम्हारी अपनी
तुमसे कुछ कहना था मगर हर बार तुम्हे देखते ही लगता है ये सब कह चुकी हुँ
और तुम हर बार अनजान बनकर पूछते हो कहो! क्या बात है ?
सच बताओ, क्या कुछ नहीं है तुम्हारे पास जो तुम मुझसे कह सको
जो कभी तन्हाई में मेरा ख्याल आते ही कहने का जी करता हो
या मेरा ख्याल तुम्हारी तन्हाई में शरीक़ नहीं है
ये सोच के डर जाती हुँ
तुम्हे तरज़ीह देकर खुद के लिए दर्द के लम्हे नहीं माँग सकती
लोगो को अक्सर ये जुमला कहते सुना है
किसी कि बहुत तवजज़ोह देने के मायने खुद का वज़ूद खो देना है
कहो क्या ये सच है ?
अगर मुझे तुम्हारी परवाह है तो में इंकार क्यों करूँ ?
क्या ईमान सज़ा का हक़दार है?
हाँ यही तो पूछना था
उम्मीद है अगली मुलाक़ात इसी सवाल के साथ होगी
तुम्हारी अपनी .......... हाँ शायद अपनी.........
.gif)
No comments:
Post a Comment