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Sunday, February 9, 2014

तमन्ना



तमन्ना

क्यों करती है ज़िद तमन्ना - मैंने पूछा, 
तो बोली -ज़िद से ही हासिल हुँ में 
वरना कहे - अनकहे ख्वाबों कि पड़ोसी हुँ मैं

मुड़ के उसी राह पर क्यों जाती है 
जहाँ मंज़िल नहीं तो बोली-
आदत से मजबूर, मुक्कमल न होने की  आदी हुँ मैं 

मुस्कुराती है होंठों पे बनके हँसी, फिर भी रूलाती है क्यों
तो बोली पूरी हो जाऊँ तो भूल जाती है तू 
बस ऐसे ही तुझे याद आना चाहती हुँ मैं 

मैंने रूठती तमन्नाओं से दोस्ती तोड़ दी है 
तो बोली अपनी तक़दीर से तोड़ दोस्ती 
क्योंकि तेरी तक़दीर से ही तुझे मिलती हुँ मैं 

भर के आंसू पूछा क्यों इतना सताती है मुझे 
तो बोली बस एक दोस्त मिल जाता है 
क्योंकि हर बार तेरी ही तरह टूट जाती हुँ मैं......

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